हाथी और कौवा

हाथी और कौवा

हाथी और कौवा बरगद का एक बड़ा वृक्ष था। लोग उसकी पूजा किया करते थे। आसपास और भी वृक्ष थे।

किंतु लोग बरगद की ही पूजा क्‍यों करते हैं? यह प्रश्‍न एक बंदर, एक हाथी और एक कौवा ने एक-दूसरे से पूछा।

ये तीनों ही उस बरगद के पास रहते थे। दिन भर अपने भोजन की तलाश में घूमते रहते।

रात में उसके नीचे विश्राम करते। वे तीनों थे तो मित्र, किंतु न तो एक-दूसरे का आदर करते और न ही एक-दूसरे की बात मानते।

उस रात जब वे बरगद के नीचे आए, तब बरगद ने काह—“मैं तुम तीनों को यहॉं वर्षों से देख रहा हूँ।

तुम लोग आपस में मित्र होकर भी एक-दूसरे को आदर-प्‍यार नहीं देते।

आज तुम पूछ रहे थे कि लोग मेरी पूजा क्‍यों करते हैं? मैं इसका उत्‍तर देना चाहता हूँ।

दरअसल मुझे सभी वृक्षों में बड़ा माना जाता है। इसलिए लाग मुझे आदर देते हैं।

वे मेरा आशीर्वाद पाकर सुखी रहते हैं।“

बरगद की बात सुनकर तीनों मित्रों को अपनी भूल मालूम हुई।

उनहोंने तय किया कि हममें जो बड़ा हो, उसका आदर बाकी दोनों करेंगे।

अब वे तीनों यह विचार करने लगे कि हममें बड़ा कौन है, इसका निर्णय कैसे हो?

कौवा ने हाथी से पूछा—“तुम इस बरगद को कब से जानते हो?”

हाथी ने उत्‍तर दिया—“जब मैं बच्‍चा था तब इस बरगद को अपनी टाँगों से लाँघ जाया करता था ।

जब मैं इसके ऊपर खडा होता था तब  इसकी फुनगी मेरे पेट को छूती थी।“

फिर यही प्रश्‍न बंदर से पूछा गया। बंदर ने काह—“जब मैं बच्‍चा था तब भूमि पर बैठकर बिना

गरदन उठाए इस बरगद के पौधे की फुनगी के अंकुरों को खाता था। इसलिए मैं इसे बहुत छोटे रूप से जानता हूँ।“

अब बंदर और हाथी ने वही प्रश्‍न कौवा से पूछा। कौवा ने काह—“पहले यहॉं से बहुत दूर एक बरगद का वृक्ष था।

मैंने उसके फल खाकर इस स्‍थान पर बीट की। उससे यह वृक्ष पैदा हुआ। इस तरह मैं इस वृक्ष को इसके जन्मकाल से जानता हूँ।“

यह सुनकर बंदर और हाथी ने कहा—“तब तो तुम ही हमसे बड़े हो।

और चूंकि तुम हमारे बड़े हो, इसलिए हम तुम्‍हारा सत्‍कार करेंगे। तुम्‍हारी वंदना करेंगे। तुम्‍हारे उपदेशानुसार चलेंगे।“

उनका यह निर्णय सुनकर बरगद बहुत प्रसन्न हुआ। उसने कहा—“जो अपने बड़ों का आदर करते हैं,

उनकी सेवा करते हैं, उनकी बात मानकर अनुशासित रहते हैं, ऐसे व्‍यक्ति जीवन में कभी असफल और दु:खी नहीं होते।“

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