सब्र का फल

सब्र का फल

सब्र का फल एक बार भगवान् बुद्ध ने एक बंजारे के घर में जन्‍म लिया।

वह बंजारा गाडि़यों में माल लादकर दूर देशों को जाया करता था।

धीरे-धीरे वह बूढ़ा हो गया तो एक दिन बोधिसत्‍तव (बुद्ध) से बोला—“बेटे, अब तुम बड़ हो गए हो।

मैं चहता हूँ कि दूर देशों के व्‍यापार के लिए अब तुम ही जाया करो। मैं एूढ़ा हो चला हूँ।“

कुछ समय बाद बोधिसत्‍तव ने बैलगाडि़यों में माल लदवाा और यात्रा पर निकल पड़े।

रास्‍ते में भोजन, पानी आदि सभी की व्‍यवस्‍था उन्‍होंने पहले ही कर ली थी।

कई दिनों की यात्रा के बाद वह एक स्‍थान पर पहुँचे। इस स्‍थान से रेगिस्‍तान शुरू होता था।

रेगिस्‍तान में भोजन और पानी की कमी न हो, इसलिए पहले उसकी व्‍यवस्‍था की गई।

रेगिस्‍तान का रास्‍ता लंबा था। बिना किसी पथ-प्रदर्शक के आगे जाना कठिन था।

इसलिए उन्‍होंने एक पथ प्रदर्शक भी साथ ले लिया।

इस प्रकार पूरी तैयारी के साथ बैलगाडि़यों का समूह रेगिस्‍तान की यात्रा पर चल पड़ा।

उस रेगिस्‍तान का रेत इतना बारीक था कि मुट्ठी में लेने पर हाथ में नहीं ठहरता था।

सूर्योदय होते ही रेत इतना गरम हो जाता था कि उसपर चलना मुश्किल हो जाता।

इसलिए वे लोग दिन में गाडि़यों को घेरे में खड़ा कर देते।

फिर उनपर मंडप तान देते और छाया में बैठकर दिन बिताते।

शाम होने पर रेत ठंडा हो जाता था। वे सारी रात यात्रा करते।

यह यात्रा समुद्र जैसी होती थी। बिना किसी पथ-प्रदर्शक के आगे बढ़ना कठिन होता था।

वह पथ-प्रदर्शक भी आकाश के तारे देखकर ही आगे बढ़ता था।

वह पूरा रेगिस्‍तान साठ मील लंबा था।

जब वे उनचास मील पार कर चुके तब पथ-प्रदर्शक ने सोचा कि अब तो एक ही रात में हम रेगिस्‍तान पार कर लेंगे।

इसलिए शाम को भोजन करके पानी, राशन आदि फेंककर वे लोग चल पड़े।

पथ-प्रदर्शक सबसे आगे की गाड़ी पर चल रहा था। लेकिन अचानक न जाने कब उसे नींद आ गई।

सवेरे देखा तो वे जिस रास्‍ते आए थे उसी रास्‍ते वापस जा रहे थे।

मजबूर होकर उन्‍हें वहीं रूकना पड़ा। लेकिन पानी और भोजन तो थ नहीं।

वे सब बहुत निराश हुए। लगा कि पानी के बिना आज वे निश्‍चय ही मौत के मुँह में चले जाऍंगे।

बोधिसत्‍व ने सोचा—यदि हिम्‍मत हार गए तो सबका नाया हो जाएगा।

वह पानी की खोज में इधर-उधर घूमने लगे। एक स्‍थान पर घास और पौधे दिखाई दिए।

उन्‍होंने सोचा कि यहॉं पानी अवश्‍य होना चाहिए।

उन्‍होंने गाड़ीवानों को बुलाकर उस जगह को खोदने के लिए कहा।

काफी गहरे खोदने पर एक बड़ा पत्‍थर निकला। इसपर सब हिम्‍मत हार गए।

बोधिसत्‍व ने सबको शांत किया और पत्‍थर में कान लगाकर सुनने लगे।

नीचे पानी बहने की आवाज सुनाई दी।

उन्‍होंने अपने एक सेवक से कहा—“अगर तूने हिम्‍मत छोड़ दी तो हमारा सबका नाश हो जाएगा।

तू ये हथौड़ा लेकर इस पत्‍थर को तोड़ दे। पानी अवश्‍य निकलेगा।“

और जब उस सेवक ने पत्‍थर तोड़ा तो पानी की बड़ी धार फूट पड़ी ।

शीतल जल को पाकर सबको जैसे जीवन मिल गया।

बोधिसत्‍तव ने कहा—“देखा, यदि मनुष्‍य हिम्‍मत करे तो बालू से भी पानी निकल सकता है।“

लालच का फल

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