लालच का फल

लालच का फल

लालच का फल एक संत तीर्थयात्रा पर निकले। वह मार्ग में पड़ने वाले गॉंवों और कस्‍बों में ठहरते जाते थे।

जहॉं जो भी भक्‍त उन्‍हें प्रेम और आदर से बुलाता, चले जाते।

एक गॉंव में एक ऐसा भक्‍त मिला जिसने उन्‍हें एक गाय दान दे दी। वह बोला—“महाराज! इसे आप साथ रखिए।

रास्‍ते में घास-पात चर लेगी और आपको दूध भी देगी।“

संत ने गाय ले ली और आगे चल पड़े। अभी वह कुछ दूर ही गए होंगे कि एक सेठ  मिला।

वह भी संत के साथ-साथ चलने लगा। सेठ  ने संत को अपना परिचय दिया।

फिर उत्‍सुकतावश पूछ बैठा—”यह गाय लेकर आप तीर्थयात्रा के लिए क्‍यों निकले हैं?”

संत ने कहा—“मैं तो अकेला ही चला था। परंतु एक भक्‍त ने इसे भी साथ कर दिया ताकि दूध मिलता रहे।“

सेठ  ने देखा कि गाय बहुत सुंदर है। दूध भी काफी देती होगी।

अगर किसी तरह इसे मैं खरीद लूँ तो इसके अच्‍छे दाम मिल जाऐगा।

यह सोचकर बोला—”महाराज! आपके लिए भला दूध की क्‍या कमी है?

जिस गॉंव में डेरा डाल देंगे, वहॉं भक्‍त लोग दूध-ही-दूध ले आएँगे।

पर इतना जरूर है कि जंगल का मामला है।

अगर गाय को खतरा हो गया तो व्‍यर्थ ही आपको पाप लगेगा।

मेरी बात मानिए, आप इसे बेच दीजिए।“

संत ने कहा—”दान में मिली गाय को बेचना भी तो पाप है। मैं तो सोचता हूँ,

आगे जो गॉंव आएगा वहॉं अगर कोई सच्‍चा भक्‍त मिल गया तो उसे ही दे दुंगा।“

सेठ का लालच अब और भी बढ़ गया। वह बोला—“सुबह-शाम भगवान् की पूजा करना,

ब्राहम्णो को दान देना, सच्‍चाई और ईमानदारी से रहना तो मेरी भी विशेषता है।

क्‍या मैं इस गाय को प्राप्‍त करने योग्‍य नहीं हूँ?”

संत उस सेठ के मन की बात समझ गए। बोले—“तुम भी इस गाय को प्राप्‍त करने के अधिकारी बन सकते हो।

लेकिन उससे पहले एक काम करना होगा। तुम अपना यह लोटा मुझे दे दो। मैं इसमें गाय का दूध दुहकर तुम्‍हें दूँगा।

यह लोटा लेकर तुम उस गॉंव तक मेरे साथ चलोगे।

यदि रास्‍ते में लोटे का एक बूँद दूध भी छलककर गिर गया तो तुम गाय प्राप्‍त करने का अधिकार खो दोगे।“

सेठ ने सोचा—इसमें कौन सी मुश्किल बात है। उसने अपना लोटा संत को दे दिया।

संत ने उसमें दूध दुहकर उसे दे दिया और वे फिर चल पड़े।

दूध से लबालब भरा लोटा लिये सेठ  भी चलने लगा।

वह बहुत खुश था कि उसे इतनी सुंदर गाय मुफ्त में ही मिल जाएगी।

सेठ  कुछ ही दूर चलकर अपने विचारों में खो गया।

उसने सोचा—मान लो, इस गाय के लिए मुझे मुँहमॉंगे दाम न मिले तो इसे मैं घर पर ही रख लूँगा।

घर के द्वार पर बँधी इतनी सुंदर गाय देखकर लोग बार-बार यही पूछेंगे कि अरे लालाजी! इसे कहाँ से ले आए।

और मैं मूँछो पर ताव देकर कहूँगा…।

इतना सोचते ही उसका एक हाथ मूँछो तक पहुँच गया और दसरे हाथ ने लोटे का संतुलन खो दिया।

फिर तो दूध छलक गया।

संत मुसकराए। बोले—“अब तो तुम गाय नहीं प्राप्‍त कर सकोगे। लेकिन एक बात गॉंठ में बॉंध लो।

कभी किसी चीज को प्राप्‍त करने के लिए मन में लालच न लाना और न ही झूठी शान दिखाना।

अगर तुम एकाग्र और शांत मन से दूध के लोटे को सँभालकर गाय प्राप्‍त करने की बात सोचते तो जरूर सफल हो जाते।

अब तो इस सीख को प्राप्‍त करके संतोष करो।“

सच और झूठ

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