लालच का नतीजा

लालच का नतीजा

लालच का नतीजा एक दुकानदार ने एक नौकर रखा। वह बहुत चुस्‍त और चतुर था।

दुकान का काम बहुत अच्‍छी तरह सँभालता था।

चाहे जितने ग्राहक आऍं, वह सभी को जल्‍दी-जल्‍दी सामान तौलकर दे दिया करता।

उधर दुकानदार जी हिसाब लगाकर पैसे ले लेते थे। लेकिन उनके मन में एक बात खटकती रहती।

उनके पिता ने कहा था—“बेटा, ज्‍यादा चुस्‍त और चतुर नौकर अच्‍छा नहीं होता।

“ दुकानदार जी कई बार इस बात पर सोच-विचार किया।

किंतु नौकर की चुस्‍ती और चतुराई के आगे कुछ कह भी न पाते।

उन्‍होनें कई बार कोशिश भी की कि उसकी गलती पकड़े। पर वह सफल न हुए।

बिना किसी गलती के वह उसे कुछ कह भी न सकते थे।

आखिर महीने भर बाद दुकानदार जी ने हिसाब-किताब बनाया।

उन्‍होंने देखा कि दुकान में जितने रुपये का माल रखा था,

आमदनी उससे कम हुई है। बहुत परेशान हुए दुकानदार जी।

कई बार जोड़ लगाया, पर घाटा अपनी जगह पर ज्‍यों-का-त्‍यों था।

दुकानदार जी ने समझ लिया कि इस नौकर ने उन्‍हें अवश्‍य धोखा दिया है।

काफी सोच-विचार के बाद वह यह भी समझ गए कि उसने जरूर

अपने आदमियों को माल ज्‍यादा तौलकर दिया है और मुझे कम बताया है।

तभी तो पैसे कम मिले है।

अगले दिन से दुकानदार जी तौलने का काम खुद करने लगे।

नौकर केवल सामान उठाकर लाता।दुकानदार जी उसे तौलकर ग्राहक को देते।

फिर सामान का बरतन नौकर वापस रख आता।

लेकिन नौकर की चालाकी को पकड़ने का कोई रास्‍ता अभी भी न निकल पाया।

दुकानदार जी सब काम बड़ी चौकसी के साथ करने लगे थे।

फिर भी उन्‍हें विश्‍वास था कि यह नौकर अभी भी कुछ–न-कुछ हरकत करता होगा।

आखिर एक दिन जब नौकर गुड़ का बरतन उठाकर लाया तो दुकानदार जी चौंक गए।

वह बरतन तो भरा हुआ था। इधर कई दिन से गुड़ लेने कोई आया भी न था।

इसका मतलब है, आजकल यह गुड़ चुराकर खाता है।

अगले दिन दुकानदार जी ने गुड़ के बरतन को खाली कर दिया।

उसमें गोंद भर दिया और गुड़ कहीं और रख दिया।

नौकर अपनी आदत के अनुसार मौका मिलते ही उस बरतन के पास गया।

दुकानदार जी की नजर बचाकर झट से बरतन में हाथ डाला और निकालकर मुँह में डाल लिया।

उधर दुकानदार जी ताक में थे।मुँह में गोंद डालते ही नौकर परेशान हो गया।

दुकानदार जी सामने आकर खड़े हो गया। नौकर न तो गोंद उगल सकता था और न खा सकता था।

दुकानदार जी ने जानबूझकर उससे कुछ कहा नहीं।

बस कुछ इस तरह इधर-उधर देखने लगे जैसे कोई खास बात नहीं है। पर वहॉं से हटे नहीं।

उधर नौकर के मुँह में गोंद गीला हो रहा था। उसकी चिपचिपाहट बढ़ रही थी।

नौकर ने वहॉं से हटना चाहा तो दुकानदार जी ने उसे एक डिब्‍बा थमा दिया।

अब वह उसे अपने साथ लेकर दुकान के बाहर आए।

उन्‍होनें आसपास के दुकानदारों को बुलाकर कहा—“मेरा चतुर नौकर चुप हो गया है।

क्‍या कोई इसे बोलने के लिए कह सकता है?”सभी लोगों ने उसे बोलने के लिए कहा।

पर गोंद से उसके दॉंत और जीभ चिपकने लगे थे। वह चाहकर भी नहीं बोल पा रहा था।

तब दुकानदार जी ने कहा—“अब देखिए, यह बोलेगा।“ और उन्‍होनें उसकी जमकर पिटाई की।

आखिर नौकर का मुँह खुल ही गया।

जब दुकानदार जी ने उसकी लालच का भंडाफोड़ किया तो लोगों ने उसकी और पिटाई की।

दुकानदार जी बोले—“लोग ठीक ही कहते हैं—ज्‍यादा चतुर बननेवाले से सावधान ही रहना चाहिए।“

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