बगुला की चतुराई

बगुला की चतुराई

बगुला की चतुराई गरमी का मौसम था। एक तालाब में पानी सूखता जा रहा था।

उस तालाब में बहुत सी मछलियॉं थीं। तालाब के किनारे एक धर्त और दुष्‍ट बगुला था।

वह साधु का वेश बनाए बैठा हुआ था। वह तालाब की मछलियों से अपना पेट भरने का उपाय सेच रहा था।

तालाब की मछलियों ने बगुले को बहुत उदास देखा। वे उसका कुशल पूछने आ गर्इ्रं।

“क्‍या बात है, मामा! आज बहुत चिंति‍त हो।“

“बस, तुम्‍हीं लोगों की चिंता में हूँ।“

“हमारी चिंता में? भला क्‍यों?”

“इस तालाब का पानी दिनोदिन कम हो रहा है। गरमी बढ़ रही है।

धीरे-धीरे तुम सब मृत्‍यु के मुख में चली जाओगी।“

“तो हम क्‍या करें, मामा? तुम्‍हीं कोई उपाय बताओ न!” मछलियों ने घबराकर कहा।

“अब एक ही उपाय है। मैं एक-एक कर तुम सबाके आनी चोंच में पकड़कर दूर एक बड़े तालाब में छोड़ आऊँ।“

“लेकिन मामा! इस दुनिया में आज तक कोई बगुला ऐसा नहीं हुआ जिसने मछलियों की भलाई के बारे में सोचा हो।

भला हम तुमपर कैसे विश्‍वास कर लें।“

बगुले ने अब अपनी चाल चली—“तुम ठीक कहती हो।

जिस तरह गंदी मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है उसी तरह एक बगुले ने सारे बगुला समाज को बदनाम कर रखा है।

तुम लोग ऐसा करो, किसी एक मछली को मेरे साथ भेजो। मैं उसे वह तालाब दिखा लाऊँगा।

तुम उससे पूछ लेना। अगर विश्‍वास हो जाए तो तुम सब एक-एक कर चलना।“

मछलियॉं धूर्त बगुले की चाल में आ गई। उन्‍होंने एक मछली को बगुले के साथ भेज दिया।

बगुला उसे बड़ा तालाब दिखाकर ले आया। उस मछली ने बड़े तालाब का बड़ा सुंदर वर्णन किया।

उससे प्रभावित होकर सभी मछलियॉं चलने को तैयार हो गईं।

अब बगुला उस तालाब से एक मछली ले जाता और दूर जंगल में एक बड़े तालाब के किनारे बड़ी चट्टान पर उसे मारकर खा जाता।

इस तरह उसने तालाब की सारी मछलियॉं खा लीं। चट्टान के पास मछलियों की हड्डियों का ढेर लग गया।

तालाब में केवल एक केकड़ा बचा था। बगुला उसे भी खना चाहता था।

केकड़ा चालाक था। बोला—“मैं तुम्‍हारी चोंच में दबकर नहीं चल सकता। कहो तो गरदन पर बैठकर चलूँ।“

बगुले ने सोचा—तू किसी तरह चट्टान तक तो चल। फिर तो मैं खा ही जाऊँगा। इस तरह उसने केकड़े की बात मान ली।

बगुला अपनी गरदन पर केकड़े को लेकर जब चट्टान के पास पहुँचा तब मछलियों की हड्डियॉं देखकर केकड़ा सारा मामला समझ गया।

उसने बगुले की गरदन में अपने डंक गढ़़ाए और बोला—“दुष्‍ट, तू मुझे सीधी रतह तालाब के किनारे ले चलता है या गरदन दबा दूँ।“

बगुला पीड़ा से कराह उठा। वह केकड़े को चुपचाप तालाब के किनारे ले गया। केकड़े ने कहा—“अब तुझे अपनी करनी का फल भी मिलना चाहिए।“

उसने बगुले की गरदन दबाकर उसे खत्‍म कर दिया। केकड़ा तालाब के पानी में चला गया। उसने जाते-जाते कहा—“धूर्त और दुष्‍ट व्‍यक्ति सदा सुखी नहीं रहते।

एक-न-एक दिन उनकी यही दशा होती है।“

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