बकरी दो गॉंव खा गई

बकरी दो गॉंव खा गई

बकरी दो गॉंव खा गई “हाय, बकरी दो गॉंव खा गई।“

एक आदमी आगरा की सड़कों पर रोता-चिल्‍लाता घूम रहा था।

लोग आश्‍चर्य में थे कि भला बकरी गॉंव कैसे खा सकती है?

आखिर यह खबर बादशाह अकबर तक पहुँची।

बादशाह ने उस आदमी को देखते ही पहचान लिया और कुछ याद आया।

उस दिन बादशाह अकबर बहुत थके हुए थे।

उन्‍हें गन्‍ने के खेत में काम करनेवाला एक किसान दिखा।

उससे बोले—“ भाई ! थोड़ा गन्‍ना का रस पिला सकते हो।“

“हॉं-हॉं, आप बैठिए। मैं अभी लाया।“

अकबर एक पेड़ की छाया में बैठ गए।

वह किसान खेत में गया।

एक गन्‍ना तोड़ा और एक बड़े लोटे में रस निकालकर ले आया।

अकबर ने गन्‍ने का रस पिया तो बहुत खुश हुए।

“अरे वाह! ऐसा रस तो हमने पहले कभी नहीं पिया। कितने गन्‍नों का रस है?”

“हुजूर, एक ही गन्‍ना तोड़ा था।“

“क्‍या? एक गन्‍ने में इतना सारा रस!” अकबर ने आश्‍चर्य से पूछा।

“मैं बिल्‍कुल सच कह रहा हूँ, हुजूर!”

“कितना लगान देते हो?”

“जी, लगान तो सिर्फ पच्‍चीस पैसे देना पड़ता है।

से हमारे बादशाह की नीयत का कमला है।

अगर उनकी नीयत ठीक न हो तो इन गन्‍नों से रस ही न निकले।“

“सिर्फ पच्‍चीस पैसे?” बादशाह ने आश्‍चर्य से पूछा।

फिर वह सोचने लगे कि ऐसे रसवाले गन्‍ने के खेत पर तो काफी रुपए लगान लगाना चाहिए।

ठीक है, आगरा पहुँचते ही इसका लगान बढ़ा दूँगा।

कुछ देर इधर-उधर की बातें करने के बाद बादशाह ने कहा—“अच्‍छा भाई, चलने से पहले जरा एक लोटा रस और पिला दो।“

किसान लोटा लेकर चला गया। इस बार उसने तीन-चार गन्‍ने तोड़े और उसका रस निकाला, फिर भी लोटा न भरा।

बादशाह अकबर उसका इंतजार कर रहे थे।

सोच रहे थे— इस बार तो इसने देर कर दी।

तभी किसान मुँह लटकाए हुए आया और लोटा बादशाह की तरफ बढ़ा दिया। लोटे में रस थोड़ा सा ही था।

“अरे! क्‍या बात है? इतना कम रस लेकर क्‍यों आए?”

“कुछ नहीं, हुजूर लगता है, अकबर बादशाह की नीयत बिगड़ गई है। उसीका असर है।“

और अकबर को लगा जैसे किसीने उसे आसमान से जमीन पर पटक दिया हो।

आदमी की नीयत में फर्क आने से क्‍या पेड़-पौधों पर भी असर पड़ता है।

उसे लगा जैसे वह मामूली किसान एक बादशाह को इनसानियत का पाठ पढ़ा रहा है।

जहॉं नियत अच्‍छी है वहॉं बचत होती है। भंडार भरा रहता है।

लालच और छोटापन आदमी को कभी सुखी नहीं बनाते।

अकबर ने कहा—“भाई! तुम जानते हो, मैं कौन हूँ? मैं बादशाह अकबर हूँ।

आज से तुम्‍हारे खेत का लगान बिल्‍कुल माफ किया।“

किसान घबराकर पूछा—“हुजूर, मैंने कोई गलत बात कह दी क्‍या?”

“नही! तुमने मुझे वह बात सिखाई है जो बड़े-बड़े शासकों को उनके विद्वान गुरू भी नहीं सिखा पाते।

जाओ, इस बार लोटा भरकर रस ले आओ।“

किसान फिर से खेत में गया। सचमुच एक ही गन्‍ने के रस से लोटा भर गया।

वह खुश होकर दौड़ा आया। उसने लोटा आगे बढ़ा दिया। अकबर ने रस पिया।

फिर पीपल का पत्‍ता उठाकर बोले—“हम इसपर तुम्‍हें दो गॉंव देने का हुक्‍म लिख रहे है।

कल आगरा आना और पक्‍के कागज लिखवा लेना। तुम्‍हारे खाने-पीनें का इंतजाम इन गॉंवों की आमदनी से हो जाएगा।“

किसान ने पीपल का पत्‍ता रख लिया। अकबर बादशाह चले गए। किसान काम में लग गया।

कुछ देर बाद वह पत्‍ते की बात भूल ही गया। वह पत्‍ता अन्‍य पत्‍तों में जा मिला।

किसान की बकरी आई और उन सब पत्‍तों को खा गई।

जब किसान को उस पत्‍ते की याद आई तो रोने-चिल्‍लाने लगा।

अब भला उसे बादशाह कैसे पहचानेंगे। उस पत्‍ते को देखे बिना कैसे गॉंव देंगे।

वह जोर-जोर से रोता-चिल्‍लाता आगरा पहुँचा—“हाय! बकरी दो गॉंव खा गई।“

अकबर ने किसान से जब सुना कि बकरी दो गॉंव कैसे खा गई तो उसके भोलेपन पर बहुत हँसे।

फिर उसे दो गॉंव का हुक्‍म लिखकर दे दिया और जाते-जाते सावधान किया—“इस बार इन गॉंवों को बकरी से बचाना।“

सारा दरबार कहकहों से गूँज उठा।

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