पुण्‍य का फल

पुण्‍य का फल

पुण्‍य का फल  एक व्‍यापारी थे। जितना कमाते थे, उससे ज्‍यादा दान देते थे।

इसलिए उन्‍हें लोग ‘दानी व्‍यापारी’ कहने लगे थे। दानी व्‍यापारी के दरबार से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटा था।

किंतु समय बदला। दानी व्‍यापारी को अपने व्‍यापार में भारी घाटा हुआ।

धीरे-धीरे सारा व्‍यापार चौपट हो गया। दानी व्‍यापारी की सारी संपत्ति बिक गई।

दानी व्‍यापारी अपनी लाज छिपाने के लिए नगर छोड़कर चल दिए।

एक नगर में आकर दानी व्‍यापारी मजदूरी करने लगे।

बड़ी मुश्किल से इतना अनाज मिल पाता था कि परिवार  का पेट भर सके।

एक दिन पत्‍नी ने कहा—“इस नगर का नगर व्‍यापारी तो आपका परिचित है।

उसने आपसे लाखों रुपए कमाए हैं। क्‍या वह मुसीबत के इन दिनों में हमारी मदद नहीं करेगा?

आप उसके पास जाकर तो देखिए।“

दानी व्‍यापारी न जाने क्‍यों नगर व्‍यापारी के पास जाने से संकोच करते थे।

इधर हाल यह था कि जो कुछ कमाते थे, उसमें से भी जरूरत पड़ने पर दूसरों को दे देते।

फिर चाहे खुद भूखे क्‍यों न रहें!

आखिर एक दिन पत्‍नी के बहुत जिद करने पर दानी व्‍यापारी नगर व्‍यापारी के पास गए।

नगर व्‍यापारी ने उन्‍हें तुरंत पहचान लिया। बड़े आदर से बैठाया। उनकी इस दशा पर बहुत दु:खी हुआ।

दानी व्‍यापारी बोले—“मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे थोड़ा धन दे दो।

उस धन से मैं अपना व्‍यापार फिर शुरू कर सकूँगा। किंतु इस समय धन के बदले में देने को मेरे पास कुछ नहीं है।

बस, जीवन भर दान देकर जो पुण्‍य कमाया है वही कहो तो बेच दूँ।“

नगर व्‍यापारी ने कहा—“ आपने तो जीवन भर दान किया है। मैं उसीके पुण्‍य के बराबर धन आपको दे दूँगा।“

दानी व्‍यापारी ने एक कागज पर अपना पुण्‍य लिखकर दे दिया।

नगर व्‍यापारी ने उसे तराजू पर तौला तो वह केवल तीन सिक्‍कों के बराबर निकला।

“क्‍या बात है दानी व्‍यापारी! अपना पुण्‍य बेचने में कंजूसी कर रहे हो।“

“दानी व्‍यापारी ने कंजूसी शब्‍द तो सुना ही नहीं।“

“तो फिर कुछ बाकी हो तो वह भी चढ़ा दो।“ नगर व्‍यापारी ने कहा।

दानी व्‍यापारी बोले—“कल मजदूरी में मुझे चार मुट्ठी अनाज मिला था। एक भिखारी आ गया।

मैंने वह अनाज उसे दे दिया। उसके कुछ दाने अभी भी मेरी झोली में पड़े है। उन्‍हें ही तौलकर देखो।“

और नगर व्‍यापारी ने उन दानों को तराजू के पलड़े पर रख दिया। दूसरे पलड़े पर वह धन चढ़ाने लगा।

उसने धीरे-धीरे सारी संपत्ति चढ़ा दी। फिर स्‍वयं भी तराजू में बैठ गया, किंतु तीन दानोंवाला पलड़ा न उठा।

वह दानी व्‍यापारी के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

बोला—“दानी व्‍यापारी, संपन्‍नता के दिनों में किए गए पुण्‍य से श्रम का कमाया पुण्‍य कहीं अधिक कीमती है।

सच्‍चा पुण्‍य तो श्रम से ही मिलता है। आपको जितने धन की जरूरत हो, खुशी से ले जाइए।“

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