दो बहन की कहानी

दो बहन की कहानी

दो बहन की कहानी दो बहनें थीं। बड़ी बहन की शादी एक धनी आदमी से हुई थी,

छोटी बहन की शादी एक गरीब आदमी से।

बड़ी बहन को अपने धन का बहुत घमंड था। बड़ी हवेली में रहती थी।

बहुत से नौकर-चाकर थे। धन से भरी तिजोरियॉं थीं।

छोटी बहन गरीब थी। साधारण सा घर था। घर का सारा काम खुद करती थी।

थोड़े में ही गुजारा करके भी खुश रहती थी।

बड़ी बहन दो बातों से दु:खी थी।

एक तो उसे हर क्षण धन चोरी हो जाने का डर रहता था।

घर के नौकरों पर भी उसे विश्‍वास न था।

उसके पास सबकुछ था, फिर भी खुश न रह पाती थी।

उसके दु:ख का दूसरा कारण था—“ छोटी बहन का सुख उसे छोटी बहन से बहुत चिढ़ होती थी

कि इसके पास कुछ भी नहीं है, फिर भी सुखी और खुश है।

एक दिन छोटी बहन अपने पति के साथ बड़ी बहन के घर मिलने गई।

बड़ी बहन ने सोचा कि यह तो गरीब हे। जरूर इसे धन की जरूरत होगी। लगता है, मागने आई है।

पर उन दोनों ने इस बारे में कुछ भी नहीं कहा। इससे बड़ी बहन और चिढ़ गई।

उसने सोचा—अगर किसी तरह इनके मन में धन का लोभ जगा दूँ तो ये भी मेरी तरह परेशान रहेंगे।

बस, उसने चटपट एक तरकीब सोच ली।

जब छोटी बहन अपने पति के साथ चलने लगी तब बड़ी बहन ने एक थैली उन्‍हें देते हुए कहा”यह छोटी सी भेंट है।

घर जाकर खोलना।“ छोटी बहन ने बहुत मना किया, किंतु पति के हने पर उसने थेली ले ली।

घर आकर छोटी बहन ने थैली खोली तो उसमें निन्‍यानबे रूपए निकले।

पति रुपए देखकर बहुत खुश हुआ। वह बोला”

अगर हम किसी तरह इसमें एक रुपया मिला दें तो यह पूरे सौ हो जाऍंगे।“

छोटी बहन बोली—“हमें ऐसे दान की राशि नहीं चाहिए। हमारे पास जो है, हम उसीमें संतोष है।“

लेकिन पति ने उसकी एक न सुनी। वह रोज इसी कोशिश में लगा रहता कि किसी तरह पैसे बच जाऍं।

फिर जब सौ रुपए हो गए तब वह उन्‍हें एक सौ एक और इस तरह बराबर बढ़ाने की फिक्र में जुट गया।

उसका लोभ ज्‍यों-ज्‍यों बढ़ा त्‍यों-त्‍यों उसकी चिंता भी बढ़ने लगी। धीरे-धीरे वह धन के लिए खाना-पीना भूलने लगा।

उसे एक ही धुन सवार रहती—रुपया…रुपया…रुपया।

छोटी बहन ने सोचा कि अब अगर उसने देर की तो उसके घर का बचा हुआ सुख भी मिट जाएगा।

बस एक दिन उसने वह थैली उठाई और बहन को वापस कर आई।

उसका पति जब शाम को घर लौटा तब वह बोली”देखो, जब से वह थैली आई, हमारा सुख-चैन समाप्‍त होने लगा ।

मैंने वह थैली बहन को लोटा दी। उसने थैली देकर हमें दु:खी बनाना चाहा था।

पर हमारे पास जब ‘संतोष’ रूपी धन है तब हम उसके धन के लिए क्‍यों अपना सुख खोऍं?”

पति ने सुना तो उसे लगा कि पत्‍नी ठीक कहती है। जब तक वह थैली घर में थी, उसे यह घर घर नहीं लगता था।

अब वह यहॉं सुख की सांस ले सकता है। संतोष रूपी धन को वह निन्‍यानबे के फेर में भूल बैठा था।

उसने कसम खाई—”अब कभी निन्‍यानबे के फेर में नहीं पड़ूँगा।“

सच और झूठ

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