चतुर व्‍यापारी

चतुर व्‍यापारी

चतुर व्‍यापारी किसी जन्‍म में भगवान् बुद्ध एक व्‍यापारी के घर पैदा हुए।

वह व्‍यापारी नगर में फेरी लगाकर अपनी चीजें बेचता था।

उसी नगर में सेरिव नाम का व्‍यापारी भी था।

जब बोधिसत्‍व यानी भगवान् बुद्ध बड़े हुए तब उनके व्‍यापारी पिता ने सेरिव के साथ उन्‍हें व्‍यापार के लिए भेजा।

सेरिव बहुत ही चतुर और कपटी व्‍यापारी था।

बोधिसत्‍व अत्‍यंत दयालु और सरल हृदय थे। वे दोनों एक नगर में पहुँचे।

उस नगर में एक सेठ था। उसके परिवार में केवल उसकी पत्‍नी और बेटी थीं।

उनके पास धन-दौलत न थी। घर में जो कुछ सामान था उसे ही धीरे-धीरे बेचकर अपना गुजारा कर रही थीं।

सेरिव और बोधिसत्‍व उस नगर में फेरी लगाने लगे। उस सेठ परिवार के घर के सामने से पहले

सेरिव गुजरा। वह आवाज दे रहा था—“मनके-मोती की माला ले लो।“

सेठ की बेटी से मॉं से काह—“अगर तुम कहो तो इस फेरीवाले से एक मोती-माला ले लूँ।“

“लेकिन बेटी! हमारे पास भला इतने पैसे कहॉं है?” मॉं ने कहा।

“मॉं! तुम्‍हे याद है, हमारे पास पीतल की एक पुरानी थाली पड़ी है। उसे ही बेचकर माला ले लूँ?”

मॉं ने सोचा—चलो बेटी की इतनी सी इच्‍छा पूरी कर दूँ। इसलिए उसने उसकी बात मान ली।

सेठ की बेटी खुशी-खुशी बाहर गई। फेरीवाले को बुलाकर बोली—“यह थाली ले लो और मुझे एक माला दे दो।“

सेरिव ने थाली को ध्‍यान से देखा।

वह मैली जरूर थी, लेकिन थी सोने की। सेरिव बोला—“यह तो दो कौड़ी की थाली है।

इसमें माला क्‍या, एक गुरिया भी नही मिल सकती। यह तो पीतल की है।“

और वह उस थाली को उपेक्षा से फेंककर चला गया।

उसने सोचा, इस तरह थाली की निंदा करने से वह उसे मुफ्त में ही ले सकेगा।

सेठ की बेटी निराश हो गई। थोड़ी देर बाद दूसरा फेरीवाला आया।

उसने इसे भी थाली दिखाकर एक माला मॉंगी। यह फेरीवाला बोधिसत्‍व थे।

उन्‍होनें थाली देखकर कहा—“यह तो सोने ही है और इसका मूल्‍य भी बहुत है।

मेरे पास तो पॉंच हजार मुद्राऍं हैं।“

“ठीक है, वही दे दो।“ सेठ की बेटी ने खुश होकर कहा।

बोधिसत्‍व ने पॉंच हजार मुद्राऍं और एक माला देकर वह थाली खरीद ली और चले गए।

कुछ देर बाद सेरिव फिर आया।

सेठ की बेटी से बोला—“लाओ, उस बेकार थाली के बदले ही मैं एक माला तुम्‍हें दे दूँ।“

“तुम झूठ बोलते हो। वह थाली सोने की थी।

एक फेरीवाला आया था और वह पॉंच हजार मुद्राओं में खरीदकर ले गया।

अच्‍छा हुआ, तुम्‍हारी बातों में आकर मैंने थाली नहीं दी।“

सेरिव बहुत दु:खी हुआ। जब वह बोधिसत्‍व से मिला तब वह उसको देखते ही सारी बात समझ गए।

उन्‍होंने कहा—“तुम तो पुराने व्‍यापारी हो।

लेकिन इतनी सी बात भूल गए कि लोभ करने और धोखे देने से व्‍यापार में सदा हानि होती है।

ईमानदारी से व्‍यापार करनेवाले को ही सोने की थाली मिलती है।“

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