गीदड़ और सिंह की कहानी

गीदड़ और सिंह की कहानी

गीदड़ और सिंह की कहानी एक सिंह और एक सिंहनी जंगल में रहते थे। उनका एक पुत्र था। सिंह और सिंहनी ने अपने पुत्र को शिकार के सभी तरीके बताए।

साथ ही विभिन्‍न प्रकार के खतरों की जानकारी भी दी।

एक दिन सिंह-पुत्र ने एक भैंसा मारा। यह देखकर सिंह और सिंहनी बड़े प्रसन्‍न हुए। उनका पुत्र अब जवान हो गया था।

सिंह और सिंहनी बूढ़े हो चलें थे। भैंसे या ऐसे ही किसी बड़े जानवर का शिकार उनसे नहीं होता था।

सिंह-पुत्र ने उन्‍हें समझाया—“अब आप दोनों परेशान न हों। जंगल में भटकने की कोई जरूरत नहीं है।

मैं यहीं शिकार ले आया करूँगा।“

यह सुनकर सिंह और सिंहनी को बहुत खुशी हुई।

अगले दिन से सिंह-पुत्र शिकार मारकर गुफा में लाने लगा। बूढ़े सिंह-सिंहनी घर बैठे भोजन प्राप्‍त करने लगे।

सिंह-पुत्र दिन भर शिकार की तलाश में भटकता रहता। इन्‍हीं दिनों उसकी मित्रता एक चापलूस गीदड़ से हो गई।

धीरे-धीरे उनकी मित्रता बढ़ी तो वह सिंह-पुत्र के साथ गुफा में भी आने लगा।

बूढ़े सिंह ने समझाया—“बेटे, यह गीदड़ बहुत दुष्‍ट होता है। अपने स्‍वार्थ के लिए कुछ भी कर सकता है।

इससे मित्रता करना अच्‍छा नहीं है।“

सिंह-पुत्र जोशीला और ताकतवाला था। उसने अपनी शक्ति का विचार कर पिता की सलाह टाल दी।

उसने सोचा कि यह गीदड़ मेरा क्‍या बिगाड़ेगा। मेरे एक थप्‍पड़ मात्र से यह मर जाएगा।

गीदड़ को सिंह-पुत्र की मित्रता से मुफ्त में भोजन मिलता। इसलिए वह सिहं-पुत्र का वफादार मित्र होने का खूब दिखावा करता।

सिंह-पुत्र उसकी बातों में इतना आ गया कि वह गीदड़ उसकी गुफा के बाहर ही रहने लगा।

एक दिन गीदड़ ने काह—“मित्र! तुम्‍हारी कृपा से मैंने लगभग सभी जानवरों का मांस खाया है। लेकिन अब तक घोड़े का मांस नहीं खाया।“

“इस जानवर का मांस तो आज तक मैंने भी नही खाया। यह किस जंगल में है?”

“वह मैं बता दूँगा।“ गीदड़ ने कहा।

अगले दिन गीदड़ उसे एक बस्‍ती के पास ले गया। वहॉं घोड़ों का व्‍यापारी रहता था। उसके घोड़े नदी किनारे चर रहे थ।

गीदड़ का संकेत पाकर सिंह-पुत्र घोड़ों पर झपटा और एक घोड़े को मारकर उठा लाया।

घोड़े को गुफा में लाकर सभी ने खाया। किंतु बूढ़े सिंह ने अपने बेटे को समझाया—“बेटा, यह काम खतरनाक है।

घोड़े का शिकार करना हमारे लिए मौत का कारण बन सकता है। शिकारी हमारी टोह में गुफा तक आ सकते हैं।

इसलिए कल से यह काम न करना।“

अगले दिन जब सिह-पुत्र ने यह बात गीदड़ से कही, तब वह बोला—“तुम बहादुर हो। तुम्‍हारे सामने भला शिकारी कैसे टिक सकते हैं।

चलो, आज फिर घोड़ा मारकर लाऍंगे।“

उस दिन फिर वे घोड़ा मारकर ले आए। सिंह-पुत्र का हौसला बढ़ गया। उसे लगा, मित्र गीदड़ ठीक कहता है।

पिता तो बुढ़ापे के कारण मुझे यों ही डराते हैं।

उधर घोड़ों का व्‍यापारी सिंह के हमले से सावधान हो गया था। उसने एक शिकारी को बुलाया।

वह तीर-कमान लेकर सिंह-पुत्र की ताक में बैठ गया। सिंह-पुत्र तो गीदड़ के बहकावे में था।

उस दिन फिर वह घोड़े का शिकार करने पहुँचा। किंतु वह ज्‍योंही घोड़े पर झपटा कि शिकारी के तीर ने सिह-पुत्र का कलेजा फाड़ दिया।

घायल होकर सिह-पुत्र चिल्‍लाया और भागा।

इधर गीदड़ दूर छिपकर यह सारा दृश्‍य देख रहा था। वह समझ गया कि अब सिंह-पुत्र जीवित नहीं बचेगा।

जो मर जाने वाला है, उससे भला मेरी मित्रता का क्‍या महत्‍व है! यह सोचकर वह चुपचाप खिसक गया।

घायल सिह-पुत्र किसी रतह गुफा के द्वार तक पहुँचा और वहीं दम तोड़ दिया।

उसका यह हाल देखकर बूढ़े सिंह ने कहा—“बुरे लोगों का साथ करनेवाले का यही हाल होता है।

बुरी संगति में रहनेवाला व्‍यक्ति न स्‍वयं सुखी रहता है ओर न अपने मॉं-बाप को सुखी बना सकता है।

वह ऐसी बुरी संगति का फल उसी तरह भोगता है जैसे यह सिंह-पुत्र भोग रहा है।“

लालच का फल

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