कहानी: मित्रता की पहचान। दोस्‍ती की असलियत हिन्‍दी

कहानी: मित्रता की पहचान

एक दुकानदार था। उसका बहुत बड़ा व्‍यापार था। दुकानदार का एक ही बेटा था।

जब वह बड़ा हुआ तो दुकानदार के साथ व्‍यापार में हाथ बँटाने लगा।

समय-समय पर दुकानदार ने अपने बेटे को बहुत सी बातें बताई।

बेटे का एक मित्र था। मित्र क्‍या था, बस वह अधिकतर दुकान पर आ जाता था।

दुकानदार का बेटा उसके साथ इधर-उधर घूमने चला जाता था।

बस इसी तरह दोनों की मित्रता बढ़ती गई।

एक दिन बातों-ही-बातों में दुकानदार ने बेटे से पूछा—“यह जो तुम्‍हारा मित्र है, क्‍या करता है?”

“शायद कोई छोटा-मोटा व्‍यापार करता है?” “क्‍या तुम्‍हें यह बात ठीक से नहीं मालूम है?”“नही ।“

“मैं तुम्‍हें बताना चाहता हूँ कि किसी को मित्र बनाने से पहले उसके बारे में पूरी जानकारी प्राप्‍त कर लेनी चाहिए।“ दुकानदार ने समझाया।

“पिताजी! आप तो यूँही सभी पर शक करते हैं। और फिर वह भला मेरा क्‍या बिगाड़ लेगा।

वैसे मैं अच्‍छी तरह जानता हूँ कि वह ईमानदार और नेक व्‍यक्ति है।“दुकानदार ने उस समय आगे कुछ नहीं कहा।

कुछ दिन बीत गए। दुकानदार के बेटे और उसके मित्र की मुलाकातें होती रही। दुकानदार ने भी इस बारे में अपने बेटे से फिर कभी कुछ नहीं कहा।

कुछ समय बाद

दुकानदार ने दूर देश जाकर व्‍यापार करने की तैयारी की। अपने साथ बेटे को भी ले जाने वाला था। जाने से पहले दुकानदार ने बेटे से कहा — “हम परदेश जा रहे हैं। हमारे न होने से चोरी का खतरा हो सकता है। इसलिए मैंने सारा धन इस तिजोरी में बंद करके ताला लगा दिया है। सोचता हूँ, किसी ईमानदार और भरोसेमंद व्‍यक्ति के पास इसे रख दूँ। लेकिन ऐसा व्‍यक्ति कौन हो सकता है?”“इसमें कौन सी परेशानी की बात है? मेरा मित्र किस दिन काम आएगा। लाइए, यह तिजोरी मैं उसके पास रख आता हूँ।“

दुकानदार ने तिजोरी दे दी। उसका बेटा अपने मित्र के यहॉं तिजोरी रख आया। अगले दिन वे दोनों व्‍यापार के लिए चल पड़े। कई महीने बीत गए। दुकानदार ने काफी धन कमाया। अब वे घर की ओर चल पड़े।अपने घर पहुँचने पर दुकानदार ने बेटे से कहा कि मित्र के यहॉं से तिजोरी उठा लाओ। और हॉं, जरा देख लेना कि उसका वजन उतना ही है जितना पहले था या नहीं।दुकानदार का बेटा मित्र के यहॉं गया और थोडी देर में खाली हााि लौटकर आ गया। उसने कहा—“पिताजी! आपने मेरे मित्र के साथ धोखा क्‍यों किया? आपने जितोरी में धन रखने की बजाय पत्‍थर रख दिए थे? मेरा मित्र बहुत नाराज है। कहता था कि मुझे क्‍या चोर समझा है?”

दुकानदार ने शांत भाव से कहा—

“बेटा! तुमने तो अपने मित्र की परीक्षा नहीं ली, लेकिन मेरे लिए यह काम जरूरी था। धोखा मैंने नहीं किया, उसने किया है। उसकी नीयत बिगड़ गई थी। उसने बिना पूछे तिजोरी काताला तोड़ा है, जिससे उसमें रखे धन पर हाथ साफ कर सके। अगर उसने तिजोरी नहीं खोली तो उसे कैसे पता चला कि अंदर पत्‍थर हैं। वह ईमानदार नहीं, धोखेख्बाज है। मैं समझता हूँ कि अब इस परीक्षा से तुम समझ गए होगे कि तुम्‍हारा मित्र कैसा है? इसीलिए मैंने कहा था कि ‘किसी को मित्र बनाने से पहले उसे परख लेना चाहिए। इसी को कहते है मित्रता की पहचान‘ कहानी: मित्रता की पहचान

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