अपनी समझ सुनो सबकी करो अपनी समझ की

अपनी समझ सुनो सबकी करो अपनी समझ की

अपनी समझ सुनो सबकी करो अपनी समझ की एक नवयुवक था। वह पहली बार अनाज खरीदने मंडी गया।

उसके पिता ने चलते समय समझाया- ‘’बेटा, व्‍यापार में दो पैसे का लाभ भी अधिक होता है।

इसलिए सौदा करके अनाज खरीदना। समझदार आदमी की सलाह सुनना और करना अपनी समझ से।

दिन डूबने से पहले घर अवश्‍य लौट आना।‘’

अनाज की मंडी दूर एक गॉंव में थी। इ‍सलिए वह नवयुवक घोड़ा ले गया। कोई घंटे भर में मंडी पहुँच गया।

अनाज की कई दुकानें देखीं। एक जगह सौदा पट गया। उसने एक बोरा गेहूँ तुलवा लिया।

उसने सोचा- अभी समय बहुत है। क्‍यों न थोड़ा बाजार की सैर कर लूँ। और वह गेहूँ का बोरा वहीं छोड़कर सैर के लिए चल पड़ा।

धीरे-धीरे दोपहर हो गई। नवयुवक वापस आया और गेहूँ का बोरा घोड़े की पीठ पर लादकर ले चला।

बोरा लदा होने से घोड़े की पीठ पर जगह न थी। इसलि‍ए वह पैदल चलने लगा।

रास्‍ते में मिल गए लाल बुझक्‍कड़। वह सिर पर लाल पगड़ी बॉंधे अपने शिष्‍यों के साथ आ रहे थ।

इस नवयुवक को देखकर वे शिष्‍य हँसने लगे। नवयुवक को गुस्‍सा आ गया। उनसे बोला—“तुम लोग मुझे देखकर क्‍यों हँस रहे हो?”

“क्‍योंकि तुम मूर्ख हो।“ एक शिष्‍य ने कहा। “मैं मूर्ख हूँ …तुम लोग मुझे ….” वह नवयुवक लड़ने के लिए तैयार हो गया।

“ठहरो, ठहरो, मैं समझाता हूँ…” दूसरे शिष्‍य ने नवयुवक को शांत करते हुए कहा—“ बात यह है कि जब तुम्‍हारे पास घोड़ा है तो पैदल चलना मुर्खता की बात है या नही?”

“अजीब बात करते हो? देखते नहीं कि घोड़े की पीठ पर गेहूँ लदा है। मैं कैसे बैठूँ?” नवयुवक ने कहा।

“हॉं, ये हुई न बात।” शिष्‍य ने कहा —“मै केसे बैठूँ का जवाब देंगे हमारे उस्‍ताद लाल बुझक्‍कड़। आओ, उनसे पूछते हैं।

अब वे सब लाल बुझक्‍कड़ के पास आए। उन्‍होंने नवयुवक की समस्‍या बताई।

लाल बुझक्‍कड़ सुनकर पहले तो गंभीर हो गए, फिर मुसकराने लगे।

“इतनी छोटी सी बात के लिए परेशान मत हो। ‘’लाल बुझक्‍कड़ ने समझाया—‘’बोरे में क्‍या है?”

“गेहूँ।“ नवयुवक ने कहा।

“तो उतने ही वजन के पत्‍थर एक बोरे में भरो। फिर दोनों बोरे घोड़े के दोनों ओर लटका दो।

वजन बराबर हो जाएगा। घोड़े की पीठ भी खाली हो जाएगी और तुम बैठकर जा सकोगे।“

“ये हुई ने अकल की बात।“ शिष्‍यों ने एक स्‍वर में कहा।

नवयुवक ने सोचा, यह समझदार आदमी है। इसकी बात माननी चाहिए।

उधर लाल बुझक्‍कड़ आगे बढ़ गए।

नवयुवक ने एक बोरे में पत्‍थर भरे और उसे एक ओर लटकाकर गेहूँ का बोरा दूसरी तरफ कर दिया।

अभी वह बैठने की बात सोच ही रहा था कि कुछ सोचकर रुक गया। घोड़ा धीरे-धीरे चलने लगा।

कुछ दूर चलने पर नवयुवक को ख्‍याल आया कि दिन डूबने से पहले घर पहुँचना है।

इस तरह पैदल चलकर तो वह कभी नहीं पहुँच सकता।

इसलिए वह जल्‍दी से घोड़े की पीठ पर बैठ गया। उसके बैठते ही घोड़ा गिर पड़ा।

वही आस पास के लोग मदद के लिए दौड़ पड़े।

उन्‍होंने नवयुवक और घोड़े को बड़ी मुश्किल से उठाकर खड़ा किया।

फिर जब बोरे में पत्‍थर भरे हुए देखे तो सब नवयुवक को डॉंटने लगे—“अजीब मुर्ख हो। इतना वजन घोड़े पर लादकर चलते हो।

बेचारे जानवर पर जरा भी दया नहीं आयी?”

“तुम लोग भी मुझे मूर्ख कहते हो?” नवयुवक परेशान होकर बोला।

“हॉं-हॉं, तुम मुर्ख हो। नही तो वजन के बराबर करने के लिए पत्‍थर क्‍यों भरते।“

“लेकिन यह तो लाल पगड़ीवाले ने सिखाया था। जैसा उसने कहा, मैंने वैसा ही किया।“

“तो तुम्‍हें लाल बुझक्‍कड़ ने मुर्ख बना दिया। वह तो है ही मुर्ख।“

फिर उन्‍होने समझाया—“अरे भाई पत्‍थर लादने की बजाय गेहूँ को दो हिस्‍सों में बॉंटकर बोरे से भर लेते।

दोनों बोरे लटक देते तो वजन भी कम हो जाता और तुम भी बैठकर चले जाते। कुछ अपनी समझ भी तो लगाई होती।“

नवयुवक को लगा कि वह तो सचमुच ही मुर्ख बन गया। उसने तुरंत पत्‍थर फेंक दिए।

आधा गेहूँ दूसरे बोरे में भरकर लटक दिया। अब जैसे ही वह घोड़े की पीठ पर चढ़ा तो घोड़ा सरपट भाग चला।

शाम होने से पहले वह घर भी पहॅुंच गया। आज उसने एक नया सबक सीखा था—‘सुनो सबकी, करो अपनी समझ की।‘

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