अंतिम शिक्षा

अंतिम शिक्षा

अंतिम शिक्षा एक साधु थे। उनका बहुत बड़ा आश्रम था। उसमें बहुत से विद्यार्थी रहते थे।

वे साधु से विद्या प्राप्‍त करते थे। साधु उन्‍हें धर्म, नीति और विविध विषयों की शिक्षा दिया करते थे।

वे विद्यार्थी बचपन से ही आश्रम में आकर रहने लगे थे।

जब वे विद्यार्थी बड़े हो गए और उनकी शिक्षा पूरी हो गई तब साधु ने उनकी परीक्षा लेने का निश्‍चय किया।

उन्‍होंने यह बात किसी को बताई नहीं।

साधु के एक कन्‍या थी। वह भी अब बड़ी हो गई थी। साधु उसका विवाह करना चाहते थे।

उन्‍होंने सोचा कि यदि इन वि़द्यार्थियों में से ही कोई सुयोग्‍य वर मिल जाए तो उसका विवाह कर दूँ।

साधु ने एक उपाय सोचा। इससे शिष्‍यों की परीक्षा भी हो जाएगी और कन्‍या के लिए सुयोग्‍य वर भी मिल जाएगा।

अगले दिन साधु ने सभी शिष्‍यों की सभा बुलाई। उन्‍होंने कहा—“मैंने तुम्‍हें सभी विषयों की पूर्ण शिक्षा दे दी है।

अब तुम सब बड़े हो गए हो, शिक्षित भी हो गए हो। तुम्‍हें अब सांसारिक जीवन में प्रवेश करना है।

जीवन की अच्‍छी-बुरी बातें देखनी-समझानी होंगी। इसके लिए तुम्‍हें अपनी बुद्धि का प्रयोग करना होगा।

तुम स्‍वयं निर्णय करोगे कि कौन सा काम उचित है, कौन सा अनुचित! किस बात में तुम्‍हारा हित और किसमें अहित।

“अब तुमसे मैं अपने मन की एक बात कहना चाहता हूँ। तुम सब जानते हो कि मेरे एक ही कन्‍या है।

वह सुशील है, गुणी है और सुंदर है। अब वह विवाह योग्‍य हो गई है।

मेरी इच्‍छा है कि मैं तुममें से ही किसी योग्‍य वर के साथ उसका विवाह कर दूँ।

किंतु मुझे उसका चुनाव करना है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम सभी उसके लिए कपड़े और गहने लेकर आओ।

ये कपड़े और गहने तुम्‍हें अपने घर से माता-पिता की नजर बचाकर लाने होंगे।

यदि किसीने उन कपड़ों और गहनों को देख लिया तो उन्‍हें मैं स्‍वीकार नहीं करूँगा।

सबसे अच्‍छे कपड़े और गहने लानेवाले का चुनाव होगा। तभी विवाह का निर्णय होगा।

साधु की बात सुनकर सभी शिष्‍य अपने-अपने घर की ओर चल दिए।

कुछ ही दिनों बाद वे शिष्‍य अपने-अपने घर से कपड़े और गहने चुराकर लाने लगे।

वे साधु को विश्‍वास दिलाते थे कि उन वस्‍तुओं पर किसी की नजर नहीं पड़ी।

साधु सभी की वस्‍तुऍं अलग-अलग उनके नाम लिखकर रखते जाते थे।

सबसे अंत में आनेवाला शिष्‍य खाली हाथ लौटा।

साधु ने सभी शिष्‍यों की सभा बुलाई। उन्‍होनें शिष्‍य से खाली हाथ लौटने का कारण पूछा।

शिष्‍य ने उत्‍तर दिया—“गुरुदेव! आपने सिखाया था कि ईश्‍वर सब जगह है।

वह पेड़, जल, पर्वत, वायु, फूल आदि सभी में व्‍याप्‍त है।

तो भला कैसे संभव था कि मैं आपके लिए ऐसी वस्‍तुऍं लेकर आऊँ जिन्‍हें किसी ने देखा ही न हो।

ईश्‍वर तो देख रहा था। इसके साथ ही आपने कहा था कि अब हमें ही सोचना है कि कौन सा काम सही है या गलत है।

मैंने इस काम को चोरी और बुरा समझा।

जो गलत काम है उसके लिए गुरु की आज्ञा न मानने का अपराध क्षमा हो जाता है। इसलिए मैं खाली हाथ लौट आया।“

साधु बहुत प्रसन्‍न हुए। उन्‍होनें शिष्‍यों से कहा—“मैंने तुम्‍हारी परीक्षा भी ले ली और कन्‍या के लिए वर भी खोज लिया।

इसने जो कुछ कहा है, उसे तुम समझ गए होगे।“

फिर उन्‍होंने सभी के गहने और कपड़े लौटाते हुए कहा—“ये सब तुम वापस ले जाओ।

मुझे इनकी जरूरत न थी। लेकिन इसे तुम मेरी अंतिम शिक्षा समझना और फिर कभी जीवन में बिना सोचे कोई काम न करना।

इसे भी पढ़े :चूहा बेचकर कैसे बना करोड़पति

नवीनतम सरकारी रोजगार समाचार हेतु इस वेबसाइट में विजिट करे :  https://freesolution.in

Close
Social profiles